Monday, June 15, 2020

स्वास्थ्य ढांचा -- एक नजर


स्वास्थ्य ढांचा -- एक नजर
स्वास्थ्य रक्षा का क्षेत्र पिछले कुछ समय से बराबर चर्चा में है।
सबसे पहले इसकी रिपोर्ट आई कि किस तरह दिल्ली के दो जाने माने निजी अस्पतालों -- मैक्स तथा फोर्टिस-- ने सारी नैतिकता को ताक पर रखकर मरीजों को निचौड़ा था। इन अस्पतालों में बिल अन्धधुन्ध तरीके से बढ़ाये गए थे और मरीज की मौत के बाद भी उसके परिजनों को परेशान किया था। इसके बाद आयी केंद्रीय बजट की ' मोदीकेअर'
की लंबी चौड़ी घोषणा , जो वास्तव में अस्पतालीय चिकित्सा निजी अस्पतालों के लिए आउट सौर्स करने की ही योजना है और अभी चन्द रोज पहले, नेशनल प्राइसिंग अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने दिल्ली में कुछ निजी अस्पतालों के ऑडिट पर आधारित एक रिपोर्ट प्रकाशित की है , जो बताती है कि किस तरह इन निजी अस्पतालों द्वारा दवाओं तथा अन्य खर्च होने वाली चीजों की आपूर्तियों के लिए दाम अनाप शनाप बढ़ाने के जरिये, करोड़ों रुपये लूटे जा रहे हैं
बेशक , ये कोई अलग थलग घटनाएं नहीं हैं बल्कि उसकी गहरी बीमारी को दिखाती हैं, जिसने भारत में स्वास्थ्य रक्षा क्षेत्र को अपने शिकंजे में जकड़ रखा है यह महत्वपूर्ण है कि देश में बीमा -आधारित स्वास्थ्य रक्षा को बढ़ावा देने से भाजपा सरकार के ग्रस्त होने और निजी अस्पतालों में बढ़ते भ्रष्टाचार के बढ़ते हुए साक्ष्यों के संबन्ध में सामने रहे साक्ष्यों के रिश्ते को समझा जाये। यह जरूरी है कि सरकार द्वारा आक्रामक तरीके से लागू की जा रही नवउदारवादी नीतियों के आम तौर पर भ्रष्टाचार पर तथा खासतौर पर स्वास्थ्य के क्षेत्र में भ्रष्टाचार पर पड़ रहे असर को देखने के लिए हम , भ्रष्टाचार के परंपरागत रूप से पहचाने जाने वाले तरीकों से आगे बढ़कर देखें। नव उदारवादी नीतियां अपने सार में सत्ता का, सार्वजनिक संस्थाओं से निजी संस्थाओं के पक्ष में हस्तांतरण करने वाली नीतियां हैं। भ्रष्टाचार की परिभाषा अगर यह है कि यह ' किसी निजी स्वार्थ की सेवा करने के लिए शासकीय सत्ता का अवैध इस्तेमाल है',तो नवउदारवाद तो भ्रष्ट व्यवस्था का साक्षात उदाहरण ही है।इसकी अभिव्यक्ति स्वास्थ्य  रक्षा सेवाओं जैसी सार्वजनिक सेवाओं के मामले में निजी उद्यमों के बोलबाले का सक्रिय सुगमाताकारक बना दिए जाने के रूप में होती है। हम इसके साक्ष्य हर रोज ही देखते हैं जब सरकार , निजी उद्यमों की श्रेष्ठता के पुल बांधते हुए , सार्वजनिक सेवाओं को कमजोर करती हैं
   खुद हमारे देश के अंदर नवउदारवादी नीतियों से और विश्वीकृत आर्थिक प्रशासन प्रणालियों के साथ एकीकरण से, संस्थागत भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलता है और इसमें स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐसा भ्रष्टाचार शामिल है।विचारधारात्मक क्षेत्र में शासन की भूमिका ऐसे ढंग से पुनर्परिभाषित करने की कोशिशें हो रही हैं , जिससे निजी हितों को लाभ पहुंचता हो। वैश्विक स्तर पर वैश्विक प्रशासन प्रणालियों का पुनर्गठन, पहले की राष्ट्र-राज्य संचालित प्रक्रिया की जगह पर ऐसी व्यवस्था की ओर ले जा रहा है , जहाँ प्रशासन के ढांचों में निजी कारपोरेशनों , फाउंडेशनों तथा प्रबन्धन कंसल्टेंसी फर्मों को ज्यादा जगह दी जा रही है इस तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) जो संयुक्त राष्ट्र संघ की व्यवस्था का हिस्सा है , बिल गेट्स फाउंडेशन जैसी निजी फाउनडेशनों तथा मैकेंजी जैसी प्रबन्धन कंसल्टेंसी फर्मों के मुकाबले में काफी कमजोर हो गया है।इस तरह की निजी फ्रमैं ही दुनिया के पैमाने पर नीतियों को संचालित करती हैं और अब भारत भी बड़े पैमाने पर नीतियों को संचालित कर रही हैं सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हम यह भी देख रहे हैं कि शासन के नियमनकारी ढांचों पर निजी खिलाडियों का कब्जा होता जा रहा है और वह भी तब जबकि शासन के इन ढांचों से इन निजी खिलाडियों को ही अनुशासित करने की उम्मीद की जाती है।
 लेकिन , चूंकि ये प्रक्रियाएं नीति में ही बदलाव के रास्ते से काम करती हैं, उनके प्रभाव की शायद ही कभी भ्रष्टाचार के रूप में पहचान की जाती है बल्कि उन्हें सिर्फ नीति में बदलाव की तरह पेश किया जाता है इस तरह ' मोदी केयर 'को इस सरकार की एक नई नीतिगत पहल की तरह ही रखा जा रहा है, कि इस सरकार की इसकी सुनियोजित कोशिश के रूप में कि स्वास्थ्य रक्षा का क्षेत्र , निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाये और इस तरह निजी क्षेत्र के लिए मुनाफे बटोरने के बहुत बड़े रास्ते खोल दिए जाएं। इस तरह की पहलों को स्पष्ट रूप से ऐसे सार्वजनिक निर्णयों के रूप में देखा जाना चाहिए, जो निजी स्वार्थों के पक्ष में काम करते हैं राष्ट्रीय स्तर तथा वैश्विक स्तर , दोनों पर ही निजी क्षेत्र के हित में जाने वाले ऐसे नीतिगत बदलावों की सही तरीके से भ्रष्टाचार के उस मौलिक स्रोत के रूप में पहचान की जानी चाहिए , जो आगे चलकर स्थानीय स्तर पर भ्रष्ट तौर-तरीकों का रूप ले लेता है ये नीतिगत बदलाव , निजी उद्यमों के काम काज के पैमाने तथा उनकी ताकत में भारी इजाफा करते हैं और इस तरह भ्रष्टाचार के नए नए रूपों को भी सामने लाते हैं।
राज्य की भूमिका में विचारधारात्मक बदलाव::
भाजपा का 'स्वास्थ्य आश्वित ' मॉडल तथा ' मोदीकेयर' की फ्लैगशिप योजना , स्वास्थ्य रक्षा प्रावधान के उस वैश्वीक नवउदारवादी मॉडल के साथ जुड़ी हुई है , जिसे' सार्वभौम स्वास्थ्य कवरेज' (यू एचसी) के नाम से जाना जाता है
यूएचसी के तहत राज्य की भूमिका में ऐसे बदलाव को बढ़ावा दिया जाता है जो उसे स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं के प्रदाता की भूमीका से हटाकर , स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं के 'प्रबंधक ' या ' नियंनकर्ता' की भूमिका में पहुंचा देता है। इस तरह के मॉडल में स्वास्थ्य रक्षा मुहैया कराने का ज्यादातर काम आउट सोरसिंग के जरिये निजी सेवा प्रदाताओं  के हवाले कर दिया जाता है मोदीकेयर में ठीक ऐसा ही करने का वादा किया जा रहा है।
    1990 के दशक के आखिर तक आते आते , ज्यादातर विकसित देशों में स्वास्थ्य प्रणालियां खस्ता हालत में पहुँच चुकी थी।यह तब तक दो दशकों से विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी बहुपक्षीय एजेंसियों द्वारा इन देशों पर लादी जा रही राजकोषीय कृपणता की नीतियों का नतीजा था।  भारत में, 1990 के दशक के आरंभ में नवउदारवादी सुधारों के शुरू किये जाने के बाद से, स्वास्थ्य रक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक सेवाओं को व्यवस्थित तरीके से फंडों के लिए तरसाया जाता रहा है। अंततः, शेष दुनिया भर की ही तरह भारत में भी इस सच्चाई को स्वीकार करना अपरिहार्य हो गया कि स्वास्थ्य प्रणालियों को खड़ा करने के लिए फौरन कदम उठाना जरूरी था बेशक , इन हालात से निपटने के लिए , सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को दोबारा खड़ा करने तथा मजबूत करने के प्रयासों को प्राथमिकता दी जा सकती थी ।लेकिन ऐसा नहीं किया गया और शासन की भूमिका को ही स्वास्थ्य सेवाओं के प्रदाता की जगह , उनके लिए 'प्रबन्धनकर्ता' या 'नियमनकर्ता' की भूमिका में बदल दिया गया।ऐसी व्यवस्था में भ्रष्टाचार अब इसके अलग-थलग मामलों तक ही सीमित नहीं रहता है कि किसी भ्रष्ट अधिकारी ने अवैध तरीके से कोई फायदा ले लिया या घूस ले ली। अब तो वह ऐसा व्यवस्थागत रूपाकार ले लेता है , जहां समूची राज्य मशीनरी को तथा अनेकानेक नीतियों को , निजी उद्यमियों के राजस्व तथा मुनाफे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा होता है यहाँ पहुंचकर भ्रष्टाचार , जैसे राजनीतिक या अन्य लाभ दिलाने के बदले में रिश्वत लिए जाने से भिन्न ,'संस्थागत भ्रष्टाचार ' का रूप ले लेता है भ्रष्टाचार , संस्थागत के उद्देश्य में ही पैठ जाता है और नियमनकारी एजेंसियों को सार्वजनिक हित में काम करने से रोका जाता है और बाजार के हित में ही काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा होता है
नियमन पर ही कब्जा:-
जैसे जैसे सरकार की भूमिका बढ़ते पैमाने पर 'नियंनकर्ता' की भूमिका तक सीमित होती जाती है , सार्वजनिक संस्थाओं के सामने एक बड़ा खतरा खड़ा होता है , जिसे ' नियमन के जरिये कब्जे ' के तौर पर जाना जाता है। इस परिघटना में होता यह है कि जिन नियमनकारी एजेंसियों को सार्वजनिक हित में उद्योगों का नियमन करने के लिए बनाया जाता है , उन पर उद्योगों द्वारा ही कब्जा कर लिया जाता है , जिनका नियमन की उनसे उम्मीद की जाती है इसका नतीजा यह होता है कि नियमनकर्ता ही उद्योगों का इस तरह से नियमन करने लगते हैं जो आम जनता के हितों की रक्षा करने के बजाय , नियमित किये जाने वाले उद्योग के ही स्वार्थों को साधता है।
   यह नियमन के जरिये कब्जा , कई अलग अलग तरीकों से होता है नियमनकारी व्यवस्था पर , जिन्हें नियमित किया जाना होता है उनका ही कब्जा इसलिए हो जाता है कि उन्हें ही ऐसे ' विशेषज्ञ' बनाकर बैठा दिया जाता है , जो सम्बंधित व्यवस्था की समझ रखते हैं मिशाल के तौर पर भारत में देवी शेट्टी , नरेश त्रेहान आदि स्वास्थ्य रक्षा के क्षेत्र के प्रमुख कारपोरेट खिलाड़ी ही ऐसे विशेषज्ञ बने बैठे हैं , जो नीतियां तय कर रहे हैं इस तरह के ' विशेषज्ञों ' की अक्सर दुहरी वफादारी होती है यानि वे उन हितों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं , जिनिक नियमन किया जाना होता है। ' हितों के टकराव ' की ऐसी समस्याओं को उद्योग से खुली आवाजाही के तौर तरीकों द्वारा और तीखा बनाया जा रहा होता है इसके चलते नियमनकारी निकायों में ऐसे लोगों को शामिल किया जाता है जो पहले या हाल -हाल तक भी , उन सत्ताओं का हिस्सा रहे होते हैं , जिनका नियमन करना होता है इस तरह मिशाल के तौर पर स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव के पद पर 30 सितम्बर 2009 को सेवानिवृत होने के कुछ ही बाद में नरेश दयाल नॉन - आफिशियल डॉयरेक्टर के तौर पर ग्लैक्सोस्मिथक्लेइन के साथ जुड़ जाते हैं
  नियमनकर्ता पर कब्जा विशेष तरह के विचारों को बढ़ावा दिए जाने के जरिये भी होता है और 1990 के बाद के भारत में विनियमन समेत नवउदारवादी सुधारों के गुणों के बखान को तो खुद भारतीय राज्य द्वारा बढ़ावा दिया जाता रहा है इसका नियमनकारी ढांचों पर महत्वपूर्ण असर पड़ा है नियमनकर्ता पर कब्जा ऐसे वातावरण में कहीं आसान हो जाता है , जहाँ ढीले ढाले नियमन से लाभ उठाने वालों की आवाज उनसे कहीं ज्यादा मजबूत होती है, जिनके हितों को इन नियमनकारी ढांचों तंत्रों के जरिये रक्षा की जानी होती है। 1990 से लगातार जो सुधार किये गए हैं उनके फलस्वरूप निजी गतिविधियों का दायरा बढ़ा है तथा नियमन का दायरा घटा है और शासन तथा बड़े उद्योगपतियों की मिलीभगत मजबूत हुई है नियमनकर्ता पर कब्जे पर एक नया मुखड़ा लगा दिया गया है और उसे अब '--नीति निर्माताओं, नियमनकारी अधिकारियों , कार्पोरेट खिलाडियों और अति-विकसित औद्योगिक लॉबी ग्रुपों के ----***का नाम दिया जाने लगा है
सार्वजनिक फंड संचालित बीमा और निजी स्वास्थ्य रक्षा :-
राज्य के यात्रा पथ में बदलाव का हम पीछे जिक्र कर आये हैं , वह निजी उद्योग द्वारा मुनाफे बटोरे जाने के रास्ते बढ़ाने में भारत सरकार की भूमिका पर भी लागू होता है। 2009 में भारत सरकार ने एक राष्ट्रव्यापी स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की थी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना( आरएसबीवाई) नाम की यह योजना , जो आंध्र प्रदेश की राजीव आयोग्यश्री योजना के नमूने पर ढाली गई थी, अस्पतालों में उपचार पर अपनी जेब से मरीनों द्वारा किये जाने वाले खर्च के 'सत्यानाशी' असर से बचाने के लिए तैयार की गई थी। राष्ट्रीय गरामिन स्वास्थ्य बीमा योजना को भारत सरकार द्वारा -- इसमें मौजूदा सरकार और पिछली सरकार दोनों शामिल हैं -- एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जाता रहा है अब 'मोदीकेयर' में इसी मॉडल को अगले स्तर तक ले जाने की कोशिश की जा रही है
     अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की संरचना पिरामिड जैसी होती है लोगों की सबसे बड़ी संख्या का प्राथमिक स्तर पर उनकी रहने तथा काम करने की जगहों पर ही उपचार किया जा सकता है थोड़े से लोगों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जैसी द्वीतीयक स्तर की संस्थाओं को भेजने की जरूरत होती है इससे भी कम लोगों को तृतीयक अस्पतालों में विशेषीकृत स्वास्थ्य रक्षा की जरूरत होती है प्राथमिक तथा द्वितीयक स्तर की स्वास्थ्य रक्षा व्यवस्था जितनी अच्छी होगी , उतना ही ज्यादा यह सुनिश्चित किया जा रहा होगा कि मरीजों की कम से कम संख्या को ही बड़ी चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के लिए , विशेषज्ञता अस्पतालों में जाने की जरूरत पड़े लेकिन, भारत की स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था तो इस पिरामिड को ही उल्ट देती है और प्राथमिक स्वास्थ्य रक्षा सुविधाओं का गला घोंटा जा रहा है
      इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इन सामाजिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को, जिन्हें बहुत हद तक निजी सेवा प्रदाताओं के साथ साझेदारी में लागू किया जा रहा था , अनेक राज्यों में पूरी व्यवस्था को ही चुना लगाने का दोषी पाया गया है। इसकी अनेक रिपोर्ट आयी हैं कि बेईमान निजी स्वास्थ्य सुविधाओं द्वारा गैर जरूरी ऑपरेशन आदि प्रक्रियाएं करने के जरिये , इन बीमा योजनाओं को खूब दुहा है मिशाल के तौर पर बाइस बाइस वर्ष की युवतियों के गर्भाशय अनावश्यक रूप से निकाले जाने की भयावह घटनाएं सामने आई हैं
निष्कर्ष:-
जहाँ किसी सार्वजनिक अधिकारी के रिश्वत लेने जैसे मामलों में भ्रष्टाचार की पहचान करना अपेक्षाकृत आसान होता है , शासन में विहित शक्तियों के निजी उद्यमियों को फायदा पहुंचाने के लिए दुरूपयोग के रूप में भ्रष्टाचार के खिन बड़े तथा बुनियादी रूप, अक्सर अनपहचाने ही रह जाते हैं इस तरह , मिशाल के तौर पर नीति में ऐसा बदलाव जो स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं को आउट सौरसिंग को बढ़ावा देता है, समूची व्यवस्था को ही प्रभावित करता है और उसके जरिये सार्वजनिक परिसंपतियों के विशाल हिस्से को निजी हाथों में पकड़ाया जा रहा होता है इसके बावजूद , इसे शायद ही कभी  भ्रष्टाचार के रूप में देखा जाता है इसी के सहारे नरेंद्र मोदी की सरकार दावे तो एक भ्रष्टाचार मुक्त सरकार मुहैया कराने के करती है , लेकिन बड़े धम- धड़ाके के साथ वः जिस आर्थिक मॉडल को आगे बढ़ाने में लगी हुई है , अभूतपूर्व पैमाने पर भ्रष्टाचार को आगे बढ़ाने वाला मॉडल है। यही स्वास्थ्य के क्षेत्र में आये दिन सामने आने वाली भ्रष्टाचार की कहानियों की जड़ है
डॉ अमित सेनगुप्त

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