आयुष्मान भारत के लिए
बीमा का रास्ता कारगर नहीं होगा:-
वैसे भी यदि सार्वभौम स्वास्थ्य रक्षा सुनिश्चित करनी हो , तप ब्रिटिश या स्कैंडिनेवियाई नमूने पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करना , बीमा के मार्ग से कहीं बेहतर है । मिशाल के तौर पर अमरीका में सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में स्वास्थ्य रक्षा पर खर्चा सबसे ऊंचे स्तर पर है यानी किसी भी स्कैन्डिवियाई या योरोपीय देश से ज्यादा। 2016 में अमरीका में सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के तौर पर स्वास्थ्य पर खर्चा 17.2 फीसद था, जबकि जर्मनी में यही हिस्सा 11.3 फीसद , स्वीडन में 11 फीसद, फ़्रांस में 11 फीसद, तथा यूनाइटेड किंगडम में 9.7 फीसद था। इसके बावजूद , गुणवत्तापूर्ण सार्वभौम स्वास्थ्य रक्षा मुहैया कराने के लिहाज से अमरीका को आमतौर पर योरोपीय देशों से पीछे माना जाता है । और इसकी वजह यही है कि अमरीका , स्वास्थ्य रक्षा के लिए बीमा के रास्ते पर चल रहा है । वहां स्वास्थ्य रक्षा के मामले पर इसलिये चोट पड़ती है कि बीमा कंपनियां , उपचार पर खर्च के दावों का निपटारा करने के बजाय , वकीलों की सेवायें लाने पर भारी खर्च करना ज्यादा पसंद करती हैं , ताकि मरीजों के उपचार के लिए अस्पतालों का भुगतान करने से बच सकें। इसका नतीजा यह होता है कि अस्पतालों को भी हमेशा इसकी जल्दी रहती है कि मरीजों की छुट्टी करें । वास्तव में अमरीका में स्वास्थ्य रक्षा की पहुंच हमेशा से ही सीमित बनी रही थी। ओबामा ने भारी विरोध के सामने स्वास्थ्य रक्षा को सार्वभौम बनाने की कोशिश भी की थी, लेकिन अब ट्रम्प प्रशासन द्वारा उसे कमजोर किया जा रहा है । वास्तव में बीमा का रास्ता मरीजों का उतना फायदा नहीं करेगा जितना फायदा बीमा कंपनियों का करेगा। इससे निजी अस्पतालों का भी फायदा होगा , जो गैर-जरूरी टैस्टों तथा चिकित्सकीय परामर्शों के जरिये , अपना कारोबार बढ़ा रहे होंगे। इसलिए गरीब जनता के लिए स्वास्थ्य रक्षा का विस्तार करने का मोदी सरकार का दावा दोनों ही पहलुओं से गलत है। पहला तो यह कि इसके लिए बीमा का रास्ता चुना गया है, जो रास्ता ही गलत है। दूसरे इसके लिए हास्यास्पद रूप से कम पैसा रखा गया है , जो इस रास्ते पर चलते हुए यह सरकार खर्च करने जा रही है ।
और यह सब इसके ऊपर से है कि देश के विशाल हिस्से में, अस्पताल ही नहीं हैं । इसलिए, अस्पताल में भर्ती होने के लिए बीमा सुरक्षा दिलाये जाने का कोई मतलब ही नहीं है । विडंबना यह है कि शायद इसी वजह से सरकार यह मन कर चल रही है कि उसे इस योजना पर कुछ खास खर्च करने की जरूरत ही नहीं है , जबकि कागज पर 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य कवरेज मुहैया कराने का दावा किया जा सकता है। जो भी हो दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य रक्षा योजना लाने का उसका दावा पूरी तरह से हवाई है ।
बीमा का रास्ता कारगर नहीं होगा:-
वैसे भी यदि सार्वभौम स्वास्थ्य रक्षा सुनिश्चित करनी हो , तप ब्रिटिश या स्कैंडिनेवियाई नमूने पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करना , बीमा के मार्ग से कहीं बेहतर है । मिशाल के तौर पर अमरीका में सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में स्वास्थ्य रक्षा पर खर्चा सबसे ऊंचे स्तर पर है यानी किसी भी स्कैन्डिवियाई या योरोपीय देश से ज्यादा। 2016 में अमरीका में सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के तौर पर स्वास्थ्य पर खर्चा 17.2 फीसद था, जबकि जर्मनी में यही हिस्सा 11.3 फीसद , स्वीडन में 11 फीसद, फ़्रांस में 11 फीसद, तथा यूनाइटेड किंगडम में 9.7 फीसद था। इसके बावजूद , गुणवत्तापूर्ण सार्वभौम स्वास्थ्य रक्षा मुहैया कराने के लिहाज से अमरीका को आमतौर पर योरोपीय देशों से पीछे माना जाता है । और इसकी वजह यही है कि अमरीका , स्वास्थ्य रक्षा के लिए बीमा के रास्ते पर चल रहा है । वहां स्वास्थ्य रक्षा के मामले पर इसलिये चोट पड़ती है कि बीमा कंपनियां , उपचार पर खर्च के दावों का निपटारा करने के बजाय , वकीलों की सेवायें लाने पर भारी खर्च करना ज्यादा पसंद करती हैं , ताकि मरीजों के उपचार के लिए अस्पतालों का भुगतान करने से बच सकें। इसका नतीजा यह होता है कि अस्पतालों को भी हमेशा इसकी जल्दी रहती है कि मरीजों की छुट्टी करें । वास्तव में अमरीका में स्वास्थ्य रक्षा की पहुंच हमेशा से ही सीमित बनी रही थी। ओबामा ने भारी विरोध के सामने स्वास्थ्य रक्षा को सार्वभौम बनाने की कोशिश भी की थी, लेकिन अब ट्रम्प प्रशासन द्वारा उसे कमजोर किया जा रहा है । वास्तव में बीमा का रास्ता मरीजों का उतना फायदा नहीं करेगा जितना फायदा बीमा कंपनियों का करेगा। इससे निजी अस्पतालों का भी फायदा होगा , जो गैर-जरूरी टैस्टों तथा चिकित्सकीय परामर्शों के जरिये , अपना कारोबार बढ़ा रहे होंगे। इसलिए गरीब जनता के लिए स्वास्थ्य रक्षा का विस्तार करने का मोदी सरकार का दावा दोनों ही पहलुओं से गलत है। पहला तो यह कि इसके लिए बीमा का रास्ता चुना गया है, जो रास्ता ही गलत है। दूसरे इसके लिए हास्यास्पद रूप से कम पैसा रखा गया है , जो इस रास्ते पर चलते हुए यह सरकार खर्च करने जा रही है ।
और यह सब इसके ऊपर से है कि देश के विशाल हिस्से में, अस्पताल ही नहीं हैं । इसलिए, अस्पताल में भर्ती होने के लिए बीमा सुरक्षा दिलाये जाने का कोई मतलब ही नहीं है । विडंबना यह है कि शायद इसी वजह से सरकार यह मन कर चल रही है कि उसे इस योजना पर कुछ खास खर्च करने की जरूरत ही नहीं है , जबकि कागज पर 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य कवरेज मुहैया कराने का दावा किया जा सकता है। जो भी हो दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य रक्षा योजना लाने का उसका दावा पूरी तरह से हवाई है ।
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