Friday, June 19, 2020

जिला अस्पतालों का निजीकरण करने के नीति आयोग के मंसूबे:-

जन स्वास्थ्य अभियान हरयाणा
जिला अस्पतालों का निजीकरण करने के नीति आयोग के मंसूबे:-
मौजूदा भाजपा की सरकार ऐसे नए नए रास्ते खोलने का मौका हाथ से नहीं जाने देती है ,जिनसे निजी उद्यमियों के मुनाफे बढ़ सकते हों।इस तरह के प्रयास को आगे बढ़ाने के लिए , लगातार नीतिगत रोइप से इस पर जोर दिया जाता रहा है कि सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण किया जाये । ऊर्जा ,जल आपूर्ति ,परिवहन , सड़क व बुनियादी ढांचा , शिक्षा और स्वास्थ्य रक्षा ,आदि करीब-करीब सभी सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण किया जा रहा है । इसके पक्ष में सरकार लगातार यही दलील देती है कि निजी सेवा प्रदाता नए निवेश लगाएंगे तथा ज्यादा कुशलता से सेवाएं मुहैया कराएँगे , वास्तव में ऐसा होने का कोई साक्ष्य नहीं है ।
उलटे खुद भारत में भी और अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी , बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण उपयोक्ताओं के लिए इन सेवाओं को महंगा बना देता है और गरीबों को इन सेवाओं से वंचित कर देता है । वास्तव में अनेक देशों में , जिनमें जर्मनी जैसे विकसित पूंजीवादी देश भी शामिल हैं , सर्वजनुक सेवाओं का ' पुर्न म्यूसिपलकरण' किया जा रहा है यानि निजीकृत कर दी गई सेवाओं का सरकार द्वारा अधिग्रहण किया जा रहा है ।
सार्वजनिक परिसंमपतियों के हस्तान्तरण का नक्शा:-
बहरहाल, भारत में तो सरकार जोर शोर से निजीकरण को ही आगे बढाने में लगी हुई है। उसी के हिसाब से नीति आयोग ने हाल ही में एक विस्तृत योजना का एलान किया है जो व्यवहारिक मायनों में दो और तीन टाईर के शहरों में जिला अस्पतालों के निजीकरण की योजना है । विश्व बैंक की सलाह पर नीति आयोग ने एक ' मॉडल कंसेशनर समझौता' तैयार किया है जो ह्रदय तथा फेफड़े के रोगों और कैंसर के मामले में स्वास्थ्य रक्षा मुहैया कराने का काम निजी क्षेत्र के हवाले किये जाने का ही नक्शा पेश करता है। इस प्रस्ताव का मकसद यही है कि जिला अस्पतालों में मौजूद सार्वजनिक सुविधाओं को तीस साल के पट्टे पर निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाये । इस तरह चलायी जा रही स्वास्थय सुविधाओं को मरीजों से 'उपचार की पूरी कीमत' वसूल करने की इजाजत होगी यानि दूसरे शब्दों में कहें तो ये सुविधाएँ अन्य निजी स्वास्थ्य सुविधाओं की तरह ही काम कर रही होंगी। नीति आयोग के प्रस्ताव में यह परिकल्पना रखी गई है कि जो मरीज सरकार की सामाजिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं , जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना तथा राज्य स्तर की ऐसी योजनाओं के दायरे में आते हैं , उन्हें इलाज के लिए भुगतान से छूट दे दी जायेगी। ऐसे मरीजों के उपचार का खरचा ,खुद सरकार द्वारा निजी सेवा प्रदाताओं को दिया जा रहा होगा ।
प्रकटतः यह योजना इस मकसद से तैयार की गई है कि सार्वजनिक अस्पतालों में और खासतौर पर बड़े शहरों तथा महानगरों से दूर पड़ने वाले अस्पतालों में प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों तथा ढांचागत सुविधाओं की जो भारी कमी है , उसे दूर करने की जरूरत है । नीति आयोग का दावा है कि यह योजना , निजी क्षेत्र से संसाधनों का प्रवाह लेकर आयेगी और स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं तक पहुंच का विस्तार करेगी । लेकिन इस तरह के दावे ढपोरशंखी कल्पना भर हैं और उनका वर्तमान हालात से कुछ लेना देना नहीं है । निजी सेवा प्रदाताओं की दिलचस्पी अपने मुनाफों में होती है और इसलिए वे उन्हीं जगहों पर ये सुविधाएँ लगाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जहां वे मरीजों से ज्यादा फीस बटोर सकते हैं । मुनाफे के लिए चलाये जा रहे निजी अस्पतालों के भौगोलिक प्रसार को हम देखें तो पता चलेगा कि ये अस्पताल लगभग पूरी तरह से ही बड़े शहरों में या उनके आस पास के इलाकों में और उन्हीं राज्यों व जिलों में केंद्रित हैं , जहाँ लोगों की खर्चा करने की सामर्थ्य ज्यादा है । इसका दूसरा पक्ष यह है कि अपेक्षाकृत गरीब जिलों में ऐसी सुविधाएँ करीब करीब गायब ही हैं । नीति आयोग की इस ' महान योजना' से होगा यह कि निजी सेवा प्रदाता , छांट - छांट कर सबसे मुनाफदेह जिलों को पकड़ेंगे और ऐसे सबसे गरीब जिलों को अनदेखा ही कर देंगे जहां लोग स्वास्थ्य सेवाओं से सबसे ज्यादा वंचित होंगे।
सिर्फ निजी क्षेत्र के फायदे के लिए :-
योजना में इसका प्रावधान भी किया गया है कि एक एस्क्रो एकाउंट खोलकर निजी सेवा प्रदाताओं को सरकार की और से मरीजों के लिए दिए जाने वाले भुगतान में हो सकने वाली देरी के जोखिम से बचाने का इंतजाम किया जायेगा। इसके अलावा सेवा प्रदाताओं को एम्बुलेंस सेवा, ब्लड बैंक , मुर्दाघर आदि सभी सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग करने का भी मौका मिलेगा। साफ है कि निजी कंपनियों के लिये लाल कालीन बिछाने में और उन्हें सार्वजनिक परिसंपतियों का मुफ्त में फायदा उठाने का मौका देने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है । एक ओर तो उन्हें सार्वजनिक धन से खड़ी की गई मौजूदा सुविधाओं का बेरोक -टोक उपयोग करने का मौका दिया जा रहा होगा और दूसरी ओर ,उनके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली द्वारा भेजे जाने वाले मरीजों की अनवरत आपूर्ति सुनिश्चित की जायेगी । निति आयोग के प्रस्ताव में ' जोखिम प्रबन्धन' का निशाना मुख्यतः यही है कि निजी सेवा प्रदाताओं के वित्तीय हितों की हिफाजत की जाये । दूसरी ओर इन प्रस्तावों में इस संबन्ध में करीब करीब कुछ भी नहीं है कि किस तरह निजी सेवा प्रदाताओं के अनैतिक आचरण से मरीजों की रक्षा की जाये।अब इसका फैशन ही चल पड़ा है कि ' निजी सार्वजनिक साझेदारी ' को दोनों के फायदे की स्थिति ' के तौर पर पेश किया जाये । लेकिन , इससे ज्यादा हास्यास्पद बात दूसरी नहीं हो सकती है। अगर कोई फायदे में रहेगा, तो कोई घाटे में भी रह रहा होगा। इस मामले में तो साफतौर पर फायदे में निजी सेवा प्रदाता ही रहने वाले हैं ,जिन्हें सार्वजनिक संसाधनों के सहारे , मरीजों के एक गारंटीशुदा प्रवाह तक पहुंच हासिल होगी, जिसका वे अपने मुनाफे के लिए दोहन कर रहे होंगे। घाटे में रहेंगे मरीज जो इन सेवा प्रदाताओं का खर्च उठाने में असमर्थ होने की सूरत में , सार्वजनिक सुविधाओं में मिलने वाली स्वास्थ्य रक्षा से भी वंचित कर दिए जाएंगे ।
असली मुद्दा यह है कि जनता की पहुंच में रहने वाली स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं के लिए इसके निहितार्थ क्या हैं ? पहला तो यही कि इस प्रस्ताव में यह अंतर्निहित है कि ज्यादातर मरीजों को सार्वजनिक सुविधाओं में भी स्वास्थ्य रक्षा के लिए भुगतान करना होगा। सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के दायरे में आने वाले मरीजों को मुफ्त इलाज मिलने का जो वायदा किया गया है, उसे हाल के एक सर्वे के संदर्भ में देखा जाना चाहिए ,जो बताता है कि मुश्किल से 12-13 फीसद लोग ही सरकारी फंड से संचालित बीमे की सुरक्षा के दायरे में आते हैं । इतना ही नहीं कथित रूप से "मुफ्त" इलाज हासिल करने वाले इन मरीजों को भी बहुत मामलों में ऐसी सेवाओं का उपयोग करने के लिए ललचाया जा रहा होगा , जो उनकी बीमा अधिकारिता के दायरे में नहीं आती हैं और इसलिए जिनका भुगतान करना होगा। जिन निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को सरकार की और से सेवा मुहैया कराने का ठेका दिया जाता है , आम तौर पर ही ऐसा करते हैं । नतीजा यह होता है कि कथित रूप से " मुफ्त" उपचार पा रहे मरीजों को अंततः अनेकानेक गैरजरूरी जांचों, दवाओं तथा प्रोसीजरों के लिए पैसा भरना पड़ता है ।
सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए निहितार्थ :-
दूसरे इस प्रस्ताव का लागू किया जाना ,स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं तक पहुंच की असमानता को और बढ़ाने का ही काम करेगा। पैसे के पीछे पीछे निजी सेवा प्रदाता , गरीब तथा दूर दराज के जिलों से भरसक दूर ही रहेंगे और ऐसे क्षेत्रों को ही सार्वजनिक व्यवस्था के भरोसे छोड़ दिया जायेगा। इस तरह सार्वजनिक सेवाओं को उन सबसे गरीब इलाकों में ही बन्द करके रख दिया जायेगा , जहाँ काम की स्थितियां सबसे कठिन होंगी और इस तरह प्रशिक्षित डॉक्टरों तथा अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को आकर्षित करने तथा अपने यहाँ बनाये रखने की सार्वजनिक अस्पतालों की सामर्थ्य और भी घट जायेगी। याद रहे कि भारत में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का पहले ही बोलबाला है और सार्वजनिक सेवाओं के लिए बहुत ही कम वित्तीय संसाधन दिए जाने के चलते , भर्ती होने वाले मरीजों के मामले में 60 फीसद और भर्ती न होने वाले मरीजों के मामले में 80 फीसद तक हिस्सा तो निजी क्षेत्र के ही हाथों में है । इस प्रस्ताव के जरिये , स्वास्थ्य रक्षा क्षेत्र के और बड़े हिस्से तक पहुंच हासिल होने पर तो निजी क्षेत्र , सार्वजनिक व्यवस्था से वित्तीय तथा मानवीय , दोनों ही तरह के संसाधन अपनी ओर खींचने में कामयाब हो जायेगा। और इस तरह सार्वजनिक क्षेत्र को ओर भी कमजोर करने के बाद , इसी स्थिति को उसके और ज्यादा निजीकरण का तर्क बना दिया जायेगा कि सार्वजनिक सेवाएं तो चल ही नहीं पा रही हैं !
तीसरे ,लाखों मरीजों को निजी सेवा प्रदाताओं की रहमोकरम पर छोड़ दिया जायेगा । अब तक का अनुभव यही दिखाता है कि निजी क्षेत्र में अनैतिक आचारों का बोलबाला है और मुनाफे निचोड़ने के लिए मरीजों का अक्सर निर्ममता से शोषण किया जाता है । दुनिया भर में ही स्वास्थ्य रक्षा के निजी प्रावधान को , सेवाओं की गुणवत्ता तथा विवेकशीलता की खामियों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन जैसाकि हम पहले ही दर्ज कर आये हैं , नीति आयोग की इस योजना में "जोखिम प्रबन्धन " मुख्यतः निजी सेवा प्रदाताओं के लिए "जोखिमों " से संबोधित है और इसमें निजी सेवा प्रदाताओं के अनैतिक आचारों से मरीजों को बचाने पर तो कोई ध्यान ही नहीं है ।
चौथे ,अस्पताली चिकित्सा का निजी सेवा प्रदाताओं के हाथों में आउटसोर्स किया जाना, वक्त गुजरने के साथ अपरिहार्य रूप से असहनीय हो जाता है क्योंकि ये सेवा प्रदाता सरकार द्वारा भरपाईयों तथा फीस की अपनी मांगें लगातार बढ़ाते जाते हैं । यह कोई सैद्धान्तिक बात नहीं है बल्कि देश भर में सामाजिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के मामले में हम ठीक यही होता हुआ देख रहे हैं । आपातकालीय चिकित्सा निजी क्षेत्र के हाथों में पकड़ा देने के प्रस्ताव को , इस दलील से सही ठहराने की कोशिश की जाती है कि सार्वजनिक सेवाओं के लिए पर्याप्त वितीय संसाधन हैं ही नहीं और उन्हें प्रशिक्षित मानव संसाधनों की भारी तंगी का सामना करना पड़ता है । इसका आसान उपचार तो यही है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं में निवेश में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की जाये और इसमें स्वास्थ्य कर्मियों के प्रशिक्षण में निवेश में बढ़ोतरी भी शामिल है । इस समय भारत में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्चा सकल घरेलू उत्पाद के 1.2 फीसद के स्तर से भी कम है । इस मामले में भारत दुनिया के 200 से ज्यादा देशों में से , सबसे नीचे के दस देशों में आता है । सरकार अगर उक्त आसान उपाय से बचती रही है तो अपने विचाराधारात्मक झुकाव के चलते जो इस धारना से संचालित होता है कि निजी उद्दम गुणों की खान है, जबकि सार्वजनिक सेवा होती ही अक्षम है । सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के संबन्ध में इस अविश्वास को सार्वजनिक स्वास्थ्य की सफलता गाथाओं के अनुभव के सामने खड़ा किया जाना चाहिए। यूके , फ़्रांस, क्यूबा, थाईलैंड और श्रीलंका , इतनी अलग अलग पृष्ठभूमियों से आयीं सफलता गाथाएं भी, सब की सब सार्वजनिक व्यवस्था से ही जुड़ी हुई हैं ।
सार्वजनिक विश्वास के साथ धोखा:-
नीति आयोग का प्रस्ताव सार्वजनिक विश्वास के साथ धोखा है। सार्वजनिक परिसंपतियाँ निजी क्षेत्र के हवाले करने के जरिये सरकार साफ तौर पर अपनी इस जिम्मेदारी से भाग रही होगी कि स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं मुहैया कराई जाएँ।किसी जमाने के योजना आयोग से भिन्न , जो सभी राज्य सरकारोँ के प्रतिनिधियों से चर्चा के बाद अपनी नीतियां सूत्रबद्ध किया करता था , नीति आयोग खुद को एक " थिंक टैंक " बताता है। ऐसा समझ जाता है कि यह योजना सबसे पहले कुछेक जिलों में , यह मानना गलत नहीं होगा कि भाजपा शासित राज्यों में ही शुरू की जायेगी। स्वास्थ्य रक्षा हमारे देश में मुख्यतः राज्यों का ही विषय है और राज्य सरकारों को सबसे पहले तो इसी पर सवाल करना चाहिए कि एक तथाकथित थिंक टैंक द्वारा सार्वजनिक नीति सूत्रबद्ध किये जाने की और उसे लागू करने की वकालत किये जाने की, वैधता ही क्या है ?
जन स्वास्थ्य अभियान हरयाणा

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