Friday, June 19, 2020

आयुष्मान भारत प्रभात पटनायक

आयुष्मान भारत
हाल ही में शुरू की गयी "आयुष्मान भारत" योजना को लेकर मोदी सरकार के दावों के फर्जीपन ने, अब तक के सारे दावों को फर्जीपन में पीछे छोड़ दिया है।लेकिन उस सरकार से इसके सिवा और उम्मीद भी क्या की जा सकती है, जिसे इसकी परवाह नहीं है कि वह क्या कर रही है बल्कि सिर्फ इसकी चिंता है कि किस तरह इसकी छवि बनाये कि बहुत-बहुत कर रही है ।
नए लेबल के साथ पुराणी शराब :
आयुष्मान भारत योजना के अलग अलग हिस्से हैं । पहला , 1,50,000 'स्वास्थ्य तथा वेलनेस' केंद्र खोलना , जोकि वास्तव में पुराने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए ही रखा गया नया चमकना नाम है। 2018-19 के संघीय बजट में ऐसे हरेक केंद्र के लिए 80 हजार रुपये का आंवटन किया गया है । जाहिर है कि इसे किसी लम्बे चौड़े नये कदम के रूप में नहीं चलाया जा सकता है।
दूसरे हिस्से में , प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई) आती है, जिसे एक बहुत जबरदस्त नई पहल के तौर पर पेश भी किया जा रहा है , जबकि यह पुराणी राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) के नए अवतार का ही मामला है। कहा जा रहा है कि यह नई योजना 10 करोड़ परिवारों (यानि 50 करोड़ लोगों ) को कवरेज देगी और हर परिवार को हर साल 5 लाख रुपये तक की बीमा सुरक्षा मुहैया करवाएगी । इसे दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा के रूप में प्रचारित किया जा रहा है । इसके बावजूद , 2018-19 के बजट में इसके लिए सिर्फ 2000 करोड़ रुपये रखे गए हैं यानी प्रतिव्यक्ति सिर्फ 40 रूपये सालाना। अगर इसमें इस योजना पर होने वाले राज्यों के खर्च को भी जोड़ लिया जाये ( इसके कुल खर्च का 40 फीसद राज्यों से आएगा जबकि 60 फीसद केंद्र से) तब भी प्रतिव्यक्ति खर्चा 67 रूपये सालाना ही बैठता है , जो हास्यापद है।
वास्तव में विडम्बना यह है कि जिस बजट में इस सरकार ने दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू करने का दावा किया है , उस बजट में स्वास्थ्य के क्षेत्र के लिए कुल आंवटन में शायद ही कोई बढ़ोतरी की गई है। 2017-2018 के 50,079.6 करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान के बाद , 2018-19 के बजट में सिर्फ 52,800 रूपये का प्रावधान किया गया है , जो रुपयों में भी सिर्फ 5 % बढ़ोतरी दिखाता है यानी वास्तविक मूल्य के हिसाब से बढ़ोतरी के नाम पर शून्य ही दिया गया है।
बिना साधन के हवाई योजना :-
नीति आयोग ने इसके संकेत दिए हैं कि स्वास्थ्य बीमा योजना के लिए आंवटन अंततः बढ़ाकर 10,000 करोड़ कर दिया जायेगा। लेकिन, उसी साँस में यह भी दावा किया जा रहा है कि इतना ही खर्च करने की जरूरत थी यानी इतना खर्च करना ही , 50 करोड़ लोगों को , हर साल 1 लाख रुपया तक के खर्च के लिए सुरक्षा देने के लिए काफी होगा। अब अगर यह भी मान लिया जाये कि भरा जाने वाला बीमे का कुल प्रीमियम मोटे तौर पर लाभार्थियों पर इस बीमा के अंतर्गत किये जाने वाले कुल खर्च के बराबर होगा, तब भी इसका मतलब यह है कि 50 करोड़ लाभार्थियों पर सालाना ज्यादा से ज्यादा 10,000 करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे होंगे यानी औसतन 200 रूपये प्रतिव्यक्ति सालाना।
अब हम सरकारी अस्पतालों को अलग छोड़ दें , जिनमें मरीजों को वैसे भी सरकारी खर्चे पर सस्ता इलाज मुहैया कराया जाता है , लेकिन जो लक्ष्य आबादी की स्वास्थ्य सम्बन्धी जरूरतें पूरी करने के लिए बहुत ही अपर्याप्त हैं , वर्ना ऐसी स्वास्थ्य बीमा योजना की जरूरत ही क्यों होती ? निजी अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने का ही एक बार का खर्चा कम से कम 500 रूपये बैठता है , वह भी तब जबकि हम दवाओं का खर्चा इससे अलग रखें । इसे देखते हुए 10,000 करोड़ सालाना का खर्चा तो लक्षित आबादी के हर सदस्य के पूरे साल में अस्पताल के एक चक्कर के लिए भी काफी नहीं होगा। इसके बावजूद नीति आयोग का मानना है कि सरकार का इतना खर्च करना ही , 10 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपया सालाना का बीमा कवर मुहैया कराने के लिए काफी होगा।
स्वतंत्र शोध कर्ताओं ने सुझाया है कि अगर वाकई 10 करोड़ परिवारों तक की बीमा सुरक्षा मुहैया करानी है , तो इस योजना के लिए कुल 1.2 लाख करोड़ रुपये के करीब की जरूरत होगी। इसका मतलब यह है कि नीति आयोग इस योजना के अंततः जिस अधिकतम खर्च को मानकर चल रहा है , उससे 12 गुणा ज्यादा खर्चे की जरूरत होगी और इस योजना के लिए 2018-2019 में जो आंवटन रखा गया है उससे 60 गुणा आंवटन की जरूरत होगी । इसलिए ,इस योजना को , जिसके लिए वास्तव में शायद ही कोई संसाधन रखे गए हैं , एक अभूतपुर्व विशाल कदम के रूप में प्रचारित करना , सिर्फ एक चुनावी स्टंट का मामला है। इसका सार्वभौम स्वास्थ्य रक्षा सुनिश्चिति करने के किसी ईमानदार प्रयास से कोई सम्बन्ध नहीं है ।
बीमा का रास्ता कारगर नहीं होगा:-
वैसे भी यदि सार्वभौम स्वास्थ्य रक्षा सुनिश्चित करनी हो , तप ब्रिटिश या स्कैंडिनेवियाई नमूने पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करना , बीमा के मार्ग से कहीं बेहतर है । मिशाल के तौर पर अमरीका में सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में स्वास्थ्य रक्षा पर खर्चा सबसे ऊंचे स्तर पर है यानी किसी भी स्कैन्डिवियाई या योरोपीय देश से ज्यादा। 2016 में अमरीका में सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के तौर पर स्वास्थ्य पर खर्चा 17.2 फीसद था, जबकि जर्मनी में यही हिस्सा 11.3 फीसद , स्वीडन में 11 फीसद, फ़्रांस में 11 फीसद, तथा यूनाइटेड किंगडम में 9.7 फीसद था। इसके बावजूद , गुणवत्तापूर्ण सार्वभौम स्वास्थ्य रक्षा मुहैया कराने के लिहाज से अमरीका को आमतौर पर योरोपीय देशों से पीछे माना जाता है । और इसकी वजह यही है कि अमरीका , स्वास्थ्य रक्षा के लिए बीमा के रास्ते पर चल रहा है । वहां स्वास्थ्य रक्षा के मामले पर इसलिये चोट पड़ती है कि बीमा कंपनियां , उपचार पर खर्च के दावों का निपटारा करने के बजाय , वकीलों की सेवायें लाने पर भारी खर्च करना ज्यादा पसंद करती हैं , ताकि मरीजों के उपचार के लिए अस्पतालों का भुगतान करने से बच सकें। इसका नतीजा यह होता है कि अस्पतालों को भी हमेशा इसकी जल्दी रहती है कि मरीजों की छुट्टी करें । वास्तव में अमरीका में स्वास्थ्य रक्षा की पहुंच हमेशा से ही सीमित बनी रही थी। ओबामा ने भारी विरोध के सामने स्वास्थ्य रक्षा को सार्वभौम बनाने की कोशिश भी की थी, लेकिन अब ट्रम्प प्रशासन द्वारा उसे कमजोर किया जा रहा है । वास्तव में बीमा का रास्ता मरीजों का उतना फायदा नहीं करेगा जितना फायदा बीमा कंपनियों का करेगा। इससे निजी अस्पतालों का भी फायदा होगा , जो गैर-जरूरी टैस्टों तथा चिकित्सकीय परामर्शों के जरिये , अपना कारोबार बढ़ा रहे होंगे। इसलिए गरीब जनता के लिए स्वास्थ्य रक्षा का विस्तार करने का मोदी सरकार का दावा दोनों ही पहलुओं से गलत है। पहला तो यह कि इसके लिए बीमा का रास्ता चुना गया है, जो रास्ता ही गलत है। दूसरे इसके लिए हास्यास्पद रूप से कम पैसा रखा गया है , जो इस रास्ते पर चलते हुए यह सरकार खर्च करने जा रही है ।
और यह सब इसके ऊपर से है कि देश के विशाल हिस्से में, अस्पताल ही नहीं हैं । इसलिए, अस्पताल में भर्ती होने के लिए बीमा सुरक्षा दिलाये जाने का कोई मतलब ही नहीं है । विडंबना यह है कि शायद इसी वजह से सरकार यह मन कर चल रही है कि उसे इस योजना पर कुछ खास खर्च करने की जरूरत ही नहीं है , जबकि कागज पर 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य कवरेज मुहैया कराने का दावा किया जा सकता है। जो भी हो दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य रक्षा योजना लाने का उसका दावा पूरी तरह से हवाई है ।
सिर्फ दावों से कैसे आयुष्मान होगा भारत :
2017 में जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति पेश की गयी थी , उसमें यह सुझाया गया था कि स्वास्थ्य पर सरकार का कुल खर्चा (केंद्र और राज्य, दोनों को मिलाकर ), सकल घरेलू उत्पाद के 1.5 फीसद के मौजूदा स्तर से बढ़ा कर , 2025 तक 2.5 फीसद कर दिया जाये। अगर केंद्र सरकार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वाकई गम्भीर होती, तो उसे स्वास्थ्य के लिए रखे गए संघीय बजट के हिस्से में खासी बढ़ोतरी करनी चाहिए थी। लेकिन, इसके बजाय हुआ यह कि स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए रखा गया कुल केंद्रीय बजट का हिस्सा ,2017-18 के संशोधित अनुमान के 2.4 फीसद के स्तर से घटकर , 2018 -19 के बजट में 2.1 फीसद ही रह गया है ।
वैसे 2025 के लिए सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 फीसद खर्च का लक्ष्य भी बहुत कम ही है । सार्वभौम स्वास्थ्य रक्षा पर जो एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ ग्रुप गठित किया गया था , उसने 2010 के अक्टूबर में योजना आयोग को अपनी जो रिपोर्ट दी थी, उसमें इसकी सिफारिस की गई थी कि 12वीं योजना पूरी होने तक , स्वास्थ्य रक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फीसद कर दिया जाये और 2022 तक बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद का 3 फीसद ।अब अगर 2017 में भी सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में स्वास्थ्य पर सरकार का खर्च 2010 के स्तर से ऊपर नहीं सरका है और 2.5 फीसद के लक्ष्य को हासिल करने को भी बारहवीं योजना के अंत यानी 2017 से आगे खिसक कर 2025 पर पहुंचा दिया गया है , इससे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्वास्थ्य रक्षा मुहैया कराने के मामले में देश में एक के बाद एक आई सरकारें कितनी गंभीर रही हैं । इतना ही नहीं ,अब जबकि 2017 में संशोधित लक्ष्य तिथि तय किये जाने के बाद भी, स्वास्थ्य रक्षा बजट के हिस्से में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है बल्कि वास्तव में इसमें पिछले साल की तुलना में 2018-19 में गिरावट ही दर्ज हुई है , यह इसी का सबूत है कि यह सरकार गरीब जनता के स्वास्थ्य के मुद्दे के साथ कैसी उदासीनता से पेश आती है । वास्तव में जब ऐसे हालात हों, मोदी सरकार के दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना शुरू करने के दावों को, एक क्रूर मजाक ही कहा जायेगा।
प्रभात पटनायक

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