Tuesday, June 16, 2020

हरयाणा बजट 2020

हरयाणा बजट 2020

राज्य में खुलेंगे नए मेडिकल कॉलेज
सरकार द्वारा राज्य के चार जिलों भिवानी, जींद, महेंद्रगढ़ और गुरुग्राम में 4 नए मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा भी इस बजट में की गई है। इसके अलावा यमुनानगर, कैथल और सिरसा में भी तीन नए मेडिकल कॉलेज शुरू होंगे। लोगों का फिजिकल फिटनेस टेस्ट भी फ्री किया जाए
हर जिले में होगी MRI की सुविधा
खट्टर सरकार ने इस बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र में भी बड़ी घोषणाएं की हैं। सरकार ने हर जिले में कैथ लैब MRI होने का प्रावधान रखा है। इसके अलावा हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में अल्ट्रासांउड की व्यवस्था की जाएगी। इसके अलावा जिलास्तर पर वेंटिलेटर की व्यवस्था पीपीपी मोड पर की जाएगी। हार्ट अटैक से लोगों को बचाया जा सके इसके लिए सार्बिटेट की गोली मुफ्त दी जाएंगी।
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने राज्य विधानसभा में शुक्रवार को 2020-21 के लिए 1,42,343 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। खट्टर के पास वित्त मंत्रालय का भी प्रभार है।
उन्होंने बजट पेश करते हुए विधानसभा में कहा कि राज्य का कर्ज चालू वित्त वर्ष के 1.76 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2020-21 में 1.98 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा।
उन्होंने कहा कि व्यय 7.7 प्रतिशत बढ़कर 1,42,343 करोड़ रुपये रहेगा। राजस्व प्राप्तियों के 15.96 प्रतिशत बढ़कर 89,964 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है।
सरकार ने कृषि के लिए 5,474.25 करोड़ रुपये, शिक्षा एवं खेल व संस्कृति के लिए 19,343 करोड़ रुपये, स्वास्थ्य एवं चिकित्सकीय शिक्षा के लिए 6,533 करोड़ रुपये, ग्रामीण विकास एवं पंचायत के लिए 6,294 करोड़ रुपये, उद्योग के लिए 349 करोड़ रुपये और पेंशन के लिए 9,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।    

Monday, June 15, 2020

Haryana Budget 2020


Haryana Budget 2020: Rs 19,343 Crore Allocated For Education, Sports And Culture, Health Sector Gets Rs 6,533 Crore

New Delhi | Jagran Business Desk: Haryana Chief Minister Manohar Lal Khattar, who also holds the finance portfolio in the state, presented Rs 1.42 lakh crore budget for the financial year 2020-21 in the Haryana Legislative Assembly.
Khattar, who presented his maiden budget, said that the debt is set to increase to Rs 1.98 lakh crore in 2020-21 as against Rs 1.76 lakh crore in the previous fiscal. He further stated that the expenditure will increase to Rs 1,42,343 crore, a rise of 7.7 per cent. Revenue receipts are expected to increase by 15.96 per cent in 2020-21 to Rs 89,964 crore, he said.
Haryana Chief Minister ML Khattar has had a pre-budget discussion with MLAs as Finance Minister. After the meeting, about 12 big suggestions came, out of which six suggestions can be included in the government's budget.
Haryana Budget 2020 Highlights:
The BJP-JJP alliance government in Haryana allocates Rs 6,294 crore to rural development and panchayat, while Rs 349 crore was given to industries and Rs 9,000 crore to pensions. 
Haryana government allocates Rs 6,533 crore to health and medical education
Rs 19,343 crore allocated to education and sports and culture
The government has allocated Rs 5,474.25 crore to agriculture.
FM announces reduction in electricity fares for framers. The new rates will be Rs 4.75 per unit. Earlier farmers have to pay Rs 7.50 per unit. 

Haryana Government will provide Isosorbide Dinitrate tablets, which are used to treat heart failures, free of cost at public places in the state. 
The state's per capita income is projected to increase to Rs 1,80,026 crore in 2019-20 as compared to Rs 1,69,409 at constant prices in the year 2018-19, showing an increase of 6.3 per cent.  
FM announces an increase of 28 per cent in state's budget for the education sector. 
Digital libraries to be opened in rural areas of the state: Khattar
Haryana govt will open 116 new model schools. Govt also plans to open English medium schools in rural areas. 
Government to open 550 new creches.
Govt announces Rs 50 crore annual grant for Haryana Gau Sewa Ayog
All the students in their final year of a degree course to get their passports free of cost. 
This budget is aimed to achieve four goals; education, health, security and self-reliance: ML Khattar
ML Khattar says that this is the first budget in which the finance minister has not consulted MLAs before the presentation. 
ML Khattar announced organic farming in 1 lakh acre of land
Khattar distributed tabs to every MLA present in the house. 
Manohar Lal Khattar started his Budget speech in the Haryana Assembly
Manohar Lal Khattar reaches Vidhan Sabha with a tab in his hand to present the budget. Earlier suitcases were used to carry budget documents. 
The discussion on the budget will take place on March 2 and the session will conclude on March 3.
The Budget session of the Haryana Assembly began on February 20.
The Chief Minister held pre-budget consultations with MLAs, seeking their suggestions on various issues related to agriculture, health, education, etc.
It will be the first time that Khattar will present the state budget. Captain Abhimanyu was the finance minister in the previous Khattar-led BJP government.

(With PTI Inputs)
Posted By: Talib Khan

भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद




भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद भले ही कृषि क्षेत्र हो. लेकिन, वर्तमान समय में भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास के पीछे मिडिल क्लास और लोअर मिडल क्लास का सबसे बड़ा हाथ है. यही कारण है कि भारत को एक 'मिडिल इनकम ग्रुप' की अर्थव्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है. कोविड-19 के जारी वैश्विक संकट के बीच भारतीय परिदृश्य में आर्थिक दृष्टिकोण से सबसे अधिक चर्चा दो पहलुओं पर हो रही हैं.

पहला, भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर आबादी यानी किसान, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर, दैनिक मजदूरी के लिए शहरों में पलायन करने वाले मजदूर और शहरों में सड़क के किनारे छोटा-मोटा व्यापार करके आजीविका चलाने वाले लोग.
दूसरा, भारतीय अर्थव्यवस्था में उत्पादन करने वाले यानी वह क्षेत्र जो इस देश में पूंजी और गैर-पूंजी वस्तुओं का उत्पादन करता है. सामान्य भाषा में कहें तो मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर या बिजनेस सेक्टर.
दुनियाभर की सरकारें इन दोनों ही पहलुओं पर काम कर रही हैं. सरकारों ने अपने देश में स्थिति से निपटने के लिए बड़े राहत पैकेज का एलान किया है और उसी क्रम में भारत सरकार ने भी गरीबों की मदद के लिए एक बड़े पैकेज का एलान किया है.

सरकार ने पहले चरण में जो राहत पैकेज जारी किया है वह पूरी तरीके से कमजोर और असंगठित क्षेत्र के लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए है. कोरोना वायरस की वजह से आए आर्थिक संकट से जूझ रहे इस तबके के लिए सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रुपये का पैकेज जारी किया है.
वैश्विक स्तर पर अमेरिका ने सबसे बड़ा आर्थिक पैकेज अपनी अर्थव्यवस्था के लिए जारी किया है. अमेरिका ने करीब 30 करोड़ लोगों के लिए 2 ट्रिलियन डॉलर यानी कुल 151 लाख करोड़ रुपये का राहत पैकेज जारी किया है. यह भारत के कुल बजट के लगभग 5 गुना ज्यादा है. यह अमेरिका की पूरी अर्थव्यवस्था के लिए है.

भारत ने अभी अपने मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर के लिए किसी बड़े पैकेज का एलान नहीं किया है. ऐसी उम्मीद है कि जल्द ही निकट भविष्य में भी किसी बड़े पैकेज का एलान किया जा सकता है. मांग के साथ-साथ अब आपूर्ति आधारित संकट देखने जा रहे उत्पादन क्षेत्र को सुचारु रूप से दोबारा चालू करने के लिए एक बड़े आर्थिक पैकेज की जरूरत पड़ेगी.
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी हो रहे राहत पैकेज के बीच में दो प्रमुख बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए.

1. भारत का मिडिल क्लास 2. आने वाली आर्थिक संकट की बुनियाद

मिडिल क्लास को चर्चा का केंद्र बिंदु बनाना इसलिए जरूरी है क्योंकि अर्थव्यवस्था में जारी हर संकट के बीच मिडिल क्लास सबसे अधिक कमजोर होता है. सरकारों द्वारा जारी होने वाले राहत पैकेज में यह क्लास शामिल नहीं हो पाता है.

आर्थिक संकट की घड़ी में अक्सर मिडिल क्लास कमजोर होता है और उसका एक हिस्सा अर्थव्यवस्था में गरीब आबादी की तरफ शिफ्ट हो जाता है. वर्तमान में कोविड-19 का संकट भी कुछ ऐसा संकेत दे रहा है.
यह संभव है कि अधिकतर छोटी सैलरी पर काम करने वाला मिडिल क्लास इस संकट में अधिक कमजोर हो और वह लोअर मिडिल क्लास या उससे भी नीचे की श्रेणी की तरफ शिफ्ट हो जाए. आईएमएफ ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी तथ्य का जिक्र किया है कि भारत का मिडिल क्लास सिकुड़ रहा है. इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि संकट के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में मौजूद मिडिल क्लास की भी आर्थिक परिस्थितियों को प्रमुखता से ध्यान दिया जाए.

अब दूसरा प्रमुख विषय आर्थिक संकट की बुनियाद को सुनने का है. प्रश्न यह है कि कोविड-19 की वजह से जारी आर्थिक संकट की बुनियाद और उसके निवारण का केंद्र बिंदु क्या होना चाहिए? क्या कोविड-19 को ही भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती का कारण मानकर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की तैयारी करनी चाहिए या फिर पिछले 2 साल से चली आ रही आर्थिक सुस्ती को भी बुनियाद के रूप में लेते हुए किसी नए प्लान पर विचार करना चाहिए?




'कोरोना कैपिटल'

दिल्ली में कोरोना वायरस के लगातार बढ़ते मामले के बीच अब कमान गृह मंत्री अमित शाह ने संभाल ली है। लेकिन पिछले साढ़े तीन महीने के दौरान केंद्र सरकार और बीजेपी प्रशासित निगम क्या कर रहे थे?
 
15 Jun 2020

दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी में कोरोना महामारी का विस्तार लगातार हो रहा है। इस कारण देश की राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की कलई खुल गई है। अपने स्वास्थ्य मॉडल पर चुनाव जीतकर दोबारा दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई केजरीवाल सरकार जहां लाचार नजर आ रही है तो अब कमान केंद्र सरकार में सबसे ताकतवर और गृह मंत्री अमित शाह ने संभाल ली है।
दिल्ली में कोरोना संकट पर हमने इस रिपोर्ट के पहले भाग में राज्य की केजरीवाल सरकार की भूमिका की पड़ताल की थी। इस दूसरे भाग में हम केंद्र और दिल्ली नगर निगम की भूमिका की पड़ताल कर रहे हैं कि वो इस संकट में किस तरह काम कर रहे हैं।
यहां आपको यह बता दें कि राष्ट्रीय राजधानी में सभी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं दिल्ली सरकार द्वारा नहीं चलाई जाती हैं। यहाँ केंद्र संचालित अस्पताल और नगर निगम संचालित अस्पताल भी हैं। केंद्र की सत्ता पर पिछले छह सालों से बीजेपी की सरकार है तो पिछले कई सालों से निगम पर भी बीजेपी का कब्जा है।
गौरतलब है कि दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है। साथ ही यह देश की राजधानी भी है। इस कारण दिल्ली के शासन में केंद्र की भूमिका होती है। इसके अलावा देश के सबसे बड़ी स्थानीय निकायों में से एक दिल्ली नगर निगम है। दिल्ली के शासन में इसका भी बहुत अहम रोल है। दिल्ली नगर निगम का हाल पहले भी अच्छा नहीं था लेकिन जबसे निगम को तीन भागों में बांटा गया है तब से नगर निगमों की स्थति और भी बदतर हुई है।
कोरोना संकट में फेल हुआ नगर निगम
अब जब राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल नजर आ रही है तो राज्य सरकार के साथ साथ केंद्र और नगर निगम की भी जिम्मेदारी है। वैसे प्रदेश में स्वास्थ्य का दायित्व राज्य सरकार का है और केजरीवाल सरकार का दावा है कि वह कुल जीडीपी का 13 से 14 प्रतिशत स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च करती है लेकिन दिल्ली में प्राथमिक स्वास्थ्य के साथ ही कई बड़े अस्पतालों का संचालन नगर निगम करते हैं। हालांकि इस माहमारी के समय जब उनकी सबसे अधिक जरूरत थी तब उसमे से अधिकांश बंद नजर आए। इसका कारण वहां इस महामारी से लड़ने के साधन मौजूद नहीं हैं।
दिल्ली में नगर निगम के अस्पतालों की बात करें तो उसमें लगभग 3500 बिस्तर हैं। हालांकि इस महामारी से लड़ने में उनका कोई खास योगदान नहीं रहा है। जैसे हिंदू राव अस्पताल नगर निगम का सबसे बड़ा अस्पताल है। यहां लगभग 1000 बिस्तर हैं। लॉकडाउन के दरम्यान यह लगभग एक महीने बंद ही रहा। बताया गया कि नगर निगम के पास इसे चलाने के लिए साधन नहीं हैं।
अब जब पानी सर से ऊपर निकल गया है तो गत रविवार को दिल्ली सरकार ने उत्तरी दिल्ली नगर निगम द्वारा संचालित हिंदू राव अस्पताल को कोविड-19 समर्पित अस्पताल घोषित किया है। हालांकि इसके बीच में राजनीति और आरोप प्रत्यारोप का दौर भी खूब चलता रहता है। नगर निगम में सत्ताधारी बीजेपी इसके लिए आम आदमी पार्टी की सरकार को जिम्मेदार ठहराती है। उसका कहना है कि उन्होंने दिल्ली सरकार से कहा है कि वो हमारे अस्पतालों का टेक ओवर कर लें और कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज करें।
लेकिन सवाल यह है कि दिल्ली सरकार उनके अस्पताल को क्यों चलाए? ये अस्पताल नगर निगम  द्वारा संचालित हैं और नगर निगम एक स्वतंत्र निकाय है। इसका अपना एक अलग बजट है। लेकिन आज जब इनकी सबसे अधिक जरूरत है तो यह पूरी तरह से फेल दिख रहे हैं। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार का भी यह कहना है कि नगर निगम की तरफ से उन्हें कोई सहयोग नहीं मिल रहा है।
सिर्फ इतना ही नहीं इस महामारी के सबसे बड़े योद्धा डॉक्टर हैं लेकिन नगर निगम ने अपने अस्पतालों के डॉक्टरों को वेतन तक नहीं दिया है। इस वजह से डॉक्टरों ने सामूहिक इस्तीफे की भी चेतावनी दी है। उत्तरी दिल्ली नगर निगम के स्टैंडिंग कमेटी चेयरमैन और बीजेपी नेता जय प्रकाश ने भी मीडिया से बात करते हुए माना है कि वो अभी डॉक्टरों के वेतन देने के हालत में नहीं और उन्होंने इसके लिए दिल्ली सरकार से मदद मांगी हैं।
विफल हुई केंद्र सरकार
इसी तरह केंद्र सरकार के रैवये को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। दिल्ली में केंद्र के अंडर में एम्स, सफ़दरजंग और आरएमएल जैसे बड़े अस्पताल आते हैं। हालंकि उनके सभी अस्पतालों में कोरोना का इलाज हो रहा है लेकिन ये अस्पताल पूरी क्षमता के साथ कोरोना की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक केंद्र सरकार के अस्पतालों की क्षमता लगभग 10,320 बिस्तरों की है। लेकिन इसमें से कोरोना के लिए केवल 835 बिस्तर ही समर्पित हैं। यह उनकी क्षमता का 10% भी नहीं है।
इसके साथ ही दिल्ली सरकार ने यह आरोप भी लगाया है कि केंद्र सरकार ने पूरे देश को कोरोना से लड़ने के लिए आर्थिक रूप से मदद भी किया है लेकिन दिल्ली की सरकार को उन्होंने एक रुपये की भी आर्थिक मदद नहीं दी थी।
आपको यहां याद दिला दें कि केंद्र की सरकार भी दिल्ली से ही चलती है और इस समय देश के स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन हैं। उनका कार्यक्षेत्र भी दिल्ली ही है। इसके बावजूद केंद्र सरकार का दिल्ली को लेकर यह दुर्भाग्यपूर्ण रवैया रहा है।
अजीब बात यह है कि पूरे देश को कोरोना से उबारने के लिए रणनीति बनाने का काम दिल्ली से ही हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर सारे बड़े रणनीतिकार यही बैठे हुए हैं लेकिन फिर भी राष्ट्रीय राजधानी अब कोरोना राजधानी बनने की तरफ अग्रसर है।
हालांकि बेहद असामान्य होते हालात के बीच रविवार से कमान गृह मंत्री अमित शाह ने संभाली है। उन्होंने उपराज्यपाल अनिल बैजल और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ बैठक के बाद कुछ कदमों की घोषणा की।
उन्होंने कहा कि अगले दो दिनों में दिल्ली में कोरोना वायरस जांच की संख्या दोगुनी की जाएगी और छह दिनों बाद इसे तीन गुना तक बढ़ाया जाएगा। गृह मंत्री ने कहा कि कुछ दिनों में दिल्ली के निरुद्ध क्षेत्रों में हर मतदान केंद्र पर कोविड-19 की जांच शुरू की जाएगी और संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाने के लिए अधिक प्रभावित क्षेत्रों यानी हॉटस्पॉट्स में घर-घर जाकर व्यापक स्वास्थ्य सर्वेक्षण कराया जाएगा।
उन्होंने कहा कि कोविड-19 के मरीजों के लिए बिस्तरों की कमी के मद्देनजर केंद्र दिल्ली को 500 रेलवे बोगियां भी उपलब्ध कराएगा। इसके अलावा महामारी से जान गंवाने वालों के अंतिम संस्कार के लिये भी विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये जाएंगे।
शाह ने कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय,दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग, एम्स और दिल्ली के तीनों नगर निगमों के चिकित्सकों का एक संयुक्त दल राजधानी के कोविड समर्पित अस्पतालों का दौरा कर वहां स्वास्थ्य व्यवस्था और तैयारियों की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करेगा।
आपको यहां याद दिला दें कि गृह मंत्री को दिल्ली की याद उच्चतम न्यायालय द्वारा मिली फटकार के बाद आई है। उच्चतम न्यायालय द्वारा तीन दिन पहले दिल्ली के अस्पतालों में खराब स्थिति को लेकर केंद्र और राज्य सरकार को फटकार लगाई गई थी।
शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय राजधानी में कम संख्या में हो रही जांच पर भी नाराजगी जाहिर करते हुए इन्हें बढ़ाने को कहा था। दिल्ली में कोविड-19 की गंभीर स्थिति को देखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी आप सरकार और केंद्र को कोरोना वायरस से संक्रमितों के लिये बिस्तरों और वेंटिलेटरों की संख्या बढ़ाने को कहा था। 

इम्युनिटी सिस्टम

कोरोना वायरस से लड़ाई में इम्युनिटी की प्रतिक्रिया को समझने के साथ-साथ इस बारे में भी जानना आवश्यक है कि इम्यून सिस्टम की विभिन्न शाखाओं के बीच अंतःक्रिया कैसे होती है।  
06 May 2020
जैसे ही इम्यून सिस्टम की मुठभेड़ SARS-C0V-2 से होती है ये कैसे अपना काम करता है और किस प्रकार से कोविड-19 जैसे गंभीर मामले में प्रगति होती है, यह आज इस नवीनतम वायरस के उपचार के विषय में मुख्य चिंता का विषय बना हुआ है। इम्युनिटी की प्रतिक्रिया को समझने के साथ-साथ इस बारे में भी जानना आवश्यक है कि इम्यून सिस्टम की विभिन्न शाखाओं के बीच अंतःक्रिया कैसे होती है।
इस बारे में एक आम सहमति बनती जा रही है और जैसा कि कोरोना वायरस के कई गंभीर मामलों में देखने में आ रहा है कि इसके लिए कहीं न कहीं अत्यधिक इम्यून प्रतिक्रिया जिम्मेदार है और कम से कम संक्रमण के प्रारंभिक चरण में इस प्रतिक्रिया को दबा कर रखा जाए। 1 मई को जर्नल ऑफ मेडिकल वायरोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन, इस तर्क की लाइन को मजबूती प्रदान करता है। यह स्टडी इस ओर इशारा करती है कि कोविड-19 के शुरुआती चरण में इम्यून सिस्टम को यदि अस्थाई तौर पर दबा कर रखा जाए तो इससे मरीज में गंभीर लक्षणों से बचा जा सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे इम्यून सिस्टम के दो मुख्य भागों के बीच की अंतर्क्रिया समूचे सिस्टम को पहले ही थका डालती है और इसके कारण कुछ रोगियों की हालत गंभीर हो सकती है।
आइए जल्दी से नज़र डालते हैं कि हमारा इम्यून सिस्टम कैसे काम करता है। इम्यून सिस्टम की दो मुख्य शाखाएं होती हैं, या कोई इसे दो मुख्य भाग भी कह सकता है। एक को नैसर्गिक इम्युनिटी प्रतिक्रिया कहते हैं, जबकि दूसरे को परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालने वाली इम्यून प्रतिक्रिया कहते हैं। शरीर की पहली रक्षा पंक्ति में नैसर्गिक इम्यून प्रतिक्रिया शामिल है, जो शरीर में संक्रमण के साथ ही सक्रिय हो जाती है। किसी पैदल सेना के समान यह विदेशी आक्रान्ता पर टूट पड़ती है। वो चाहे कोई बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या कुछ भी हो को मार डालती है, लेकिन साथ ही बाहरी हमले से शरीर की जो कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, उन्हें भी खत्म कर देता है। वहीं दूसरी और अनुकूलक इम्युनिटी कुछ दिनों के बाद सक्रिय होती है, यदि कोई वायरस नैसर्गिक इम्युनिटी से लड़ाई के बाद भी जीवित रह जाता है तो उससे लड़ने के लिए। यह अपने साथ कई विशेषज्ञ टी कोशिकाओं और बी कोशिकाओं को काम में लाता है।
वर्तमान अनुसंधान ने एक गणितीय प्रतिमान को काम में लाया है जिसे प्रतिरक्षाविज्ञान के अध्ययन में 'लक्षित कोशिका-केन्द्रित मॉडल' के रूप में जाना जाता है। इसमें शोधकर्ताओं ने इस बात की तुलना की है कि हमारा इम्यून सिस्टम सामान्य फ्लू (इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण) की तुलना में कोविड-19 के साथ कैसे काम करता है।
फ्लू एक तेजी से फैलने वाला संक्रामक रोग है जो ऊपरी श्वसन प्रणाली के कुछ लक्षित कोशिकाओं पर भी हमला करता है और कुछ ही दिनों (चार या पाँच दिनों के अंदर) के भीतर ही लगभग सभी लक्ष्य कोशिकाओं को मार डालता है। इसके कुछ ही अंतराल में सभी लक्ष्य कोशिकाओं के खात्मे के कारण वायरस के पास आसानी से उपलब्ध लक्ष्य कोशिकाओं पर हमला करने के लिए कुछ नहीं बचता। इसके चलते नैसर्गिक इम्युनिटी सिस्टम के पास शरीर में मौजूद लगभग सभी वायरस को समाप्त करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है, इससे पहले कि अनुकूलक इम्युनिटी अपनी भूमिका में आये।
लेकिन, कोविड-19 के मामले में इस नवीनतम कोरोनोवायरस की औसत ऊष्मायन अवधि ही छह दिनों की होती है, जो कि अपने आप में बेहद लंबी अवधि है। विभिन्न अध्ययन इस बात को दर्शाते हैं कि लक्ष्य कोशिकाओं के ख़त्म होने से पहले ही अनुकूलक इम्युनिटी इस लड़ाई में कूद चुकी होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे पास जो नैसर्गिक इम्युनिटी की क्षमता थी इन अधिकांश वायरस को खत्म करने की, उसके काम में दखलंदाजी देना। इसकी वजह से संक्रमण की रफ्तार तो धीमी हो जाती है लेकिन उसका पूरी तरह से खात्मा नहीं हो पाता।
इस सम्बंध में केस्क स्कूल ऑफ़ मेडिसिन ऑफ़ यूएससी के डिपार्टमेंट ऑफ़ मॉलिक्यूलर माइक्रोबायोलॉजी एंड इम्यूनोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर वेइमिंग युआन और इस स्टडी से संबंधित लेखक के हवाले से अध्ययन के निष्कर्षों के बारे में कहा गया है कि “ख़तरा इस बात को लेकर रहता है कि संक्रमण तो लगातार बढ़ता जा रहा है वहीं यह अपनी कई परतों के साथ पूरे अनुकूलक इम्यून प्रतिक्रिया को जुटाता जाता है। यदि लम्बे समय तक वायरल गतिविधि चलती रहती है तो इसके कारण इम्यून सिस्टम को लगातार जवाबी कार्रवाई करनी पड़ सकती है, जिसे साइटोकाइन तूफान के नाम से जाना जाता है। इसके जारी रहने से स्वस्थ कोशिकाएं मारी जाती हैं और उसकी वजह से टिशु क्षतिग्रस्त होते जाते हैं।"
कुछ कोरोना वायरस मौतों के संभावित कारणों के रूप में साइटोकाइन तूफान सुर्खियों में रहा है। साइटोकाइन तूफान एक ऐसी स्थिति को दर्शाता है जब शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया निरंतर संघर्ष में थककर चूर होने वाली स्थिति में चली जाती है। ऐसी स्थिति में हमारे शरीर से होने वाली इम्यून की प्रतिक्रिया लाभ की तुलना में अधिक नुकसान पहुँचाती है। किसी संक्रमण का मुकाबला करने के लिए साइटोकाइन, छोटे प्रोटीन अणु के रूप में शरीर के कई अलग-अलग कोशिकाओं द्वारा जारी किए जाते हैं। लेकिन जब ये प्रोटीन भारी संख्या में जुट जाते हैं तो संयुक्त रूप से ये और अधिक इम्यून कोशिकाओं को सक्रिय कर देते हैं जो उच्च उत्तेजना को जन्म देता है। कथित तौर पर साइटोकाइन तूफानों की मौजूदगी सिर्फ कोरोना वायरस में ही नहीं बल्कि SARS और MERS जैसे अन्य गंभीर श्वसन रोगों में भी मौजूद रहती है।
जहाँ तक उपचार का सम्बंध है तो कोविड-19 रोगियों में साइटोकाइन तूफान और नैसर्गिक और अनुकूलक प्रतिरोधक क्षमता के बीच की अंतर्क्रिया इस प्रकार एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू है। इससे पहले कि शरीर प्रतिरोधी प्रतिक्रिया की अधिकता से सब कुछ उखाड़ पछाड़ देने की स्थिति में चला जाए,  यदि प्रारम्भिक चरण में ही इम्युनिटी को दबाकर रखने में सफलता मिल जाए तो बाद में होने वाली गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।
नैसर्गिक और अनुकूलक इम्युनिटी के बीच की परस्पर क्रिया के सन्दर्भ में जैसा कि हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं, की वजह से देखने को मिला है कि कुछ कोरोना वायरस मरीज जो कुछ समय बाद बेहतर नजर आते हैं, उनमें दूसरी बार संक्रमण की लहर के लक्षण पहले से कहीं अधिक गंभीर नजर आते हैं।
सीन दू जो कि इस स्टडी के पहले लेखक हैं ने कहा "कुछ कोविड-19 रोगियों में लक्षण आम तौर पर कम होते जाने दिखने के बाद इस रोग के एक बार फिर से उठ खड़े होने के अनुभव देखने को मिल सकते हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि अनुकूलक और नैसर्गिक प्रतिरोधक प्रतिक्रियाओं के संयुक्त प्रभाव से अस्थाई तौर पर वायरस अपने निम्नतम स्तर पर पहुँच जाए। लेकिन यदि वायरस को समूल तौर पर नाश नहीं किया गया और इस बीच लक्ष्य कोशिकाएं पुनर्जीवित हो जाती हैं तो वायरस को एक बार फिर से उठ खड़ा होने का मौका मिल जाता है और यह एक नई ऊंचाई पर पहुँच सकता है।"
अंग्रेजी में लिखे गए इस मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।
COVID-19: Understanding Interplay Between Layers of Immune System Important for Treatment

डॉक्टरों और शिक्षकों

आज के डेली राउंड-उप में हमारी नज़र रहेगी दिल्ली के शिक्षकों और डॉक्टरों पर, जिन्हे कई महीनों से उनका वेतन नहीं मिला है | साथ ही साथ बात करेंगे की क्या सरकार कोरोना के खिलाफ इस जंग को हार चुकी है? और आखिर में, वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन बता रहे हैं की क्या है जगहों के नाम बदलने के पीछे की राजनीति |

कोविड-19 की बहुत जल्दी जांच करने पर ग़लत


अमेरिका के जॉन्स हॉप्किन्स विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में यह दावा करते हुए कहा गया है कि इस विषाणु की जांच लक्षण दिखाई देने के तीन दिन बाद करना बेहतर होता है।
 
11 Jun 2020
वाशिंगटन : अगर कोई शख्स कोविड-19 से संक्रमित होता है और शुरुआती स्तर पर ही उसकी जांच की जाती है तो नतीजों में ऐसा हो सकता है कि वह संक्रमित न पाया जाए जबकि असल में वह इस बीमारी की चपेट में आ चुका होता है।
एक अध्ययन में यह दावा करते हुए कहा गया है कि इस विषाणु की जांच लक्षण दिखाई देने के तीन दिन बाद करना बेहतर होता है।
यह अध्ययन पत्रिका ‘ऐनल्ज़ ऑफ इंटरनल मेडिसिन’ में प्रकाशित हुआ है।
अमेरिका के जॉन्स हॉप्किन्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अस्पताल में भर्ती मरीजों समेत कई अन्य मरीजों के मुंह के लार के 1,330 नमूनों का विश्लेषण किया।
अध्ययन की सह लेखक लॉरेन कुसिर्का ने कहा, ‘‘चाहे किसी व्यक्ति में लक्षण हों या न हों लेकिन वह संक्रमित नहीं पाया जाता है तो यह इस बात की गारंटी नहीं है कि वह विषाणु से संक्रमित नहीं है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘संक्रमित न पाए जाने पर हम मानते है कि यह जांच सही है और इससे दूसरे लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है।’’
वैज्ञानिकों के अनुसार जिन मरीजों के कोरोना वायरस की चपेट में आने की अधिक आशंका होती है उनका संक्रमित मानकर इलाज करना चाहिए खासतौर से अगर उनमें कोविड-19 के अनुरूप लक्षण हैं।
उनका मानना है कि मरीजों को जांच की कमियों के बारे में भी बताना चाहिए।
आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि संक्रमण की चपेट में आने के चार दिन बाद जिनकी जांच की जाती है उनमें 67 प्रतिशत से अधिक लोगों के संक्रमित न पाए जाने की संभावना होती है भले ही वे असल में संक्रमित होते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि कोरोना वायरस संक्रमण की जांच कराने का सबसे सही समय संक्रमण के आठ दिन बाद है जो कि लक्षण दिखने के औसतन तीन दिन हो सकता है।